भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे डॉ रवीन्द्र कुमार श्रीवास्तव (आर के श्रीवास्तव) बहुआयामी प्रतिभा के धनी रहे हैं। उत्तरप्रदेश के गोरखपुर निवासी एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखनेवाले डॉ श्रीवास्तव की प्रारंभिक शिक्षा बनारस के स्कूल में हुई। तत्पश्चात वह उच्चतर शिक्षा के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय चले आये। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1981 में उन्होंने अखिल भारतीय पुलिस सेवा की परीक्षा उतीर्ण की। उन्हें पश्चिम बंगाल कैडर मिला, जहां उन्होंने बतौर पुलिस अधीक्षक सेवा दी।
लेकिन उनके मन में कुछ और चल रहा था। तीन वर्ष बाद 1984 में उन्होंने अखिल भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली और आईएएस बन गए। उन्हें बिहार कैडर मिला। बाद में झारखंड अलग राज्य बनने पर उन्होंने झारखंड कैडर में सेवा देने का फैसला किया। डॉ श्रीवास्तव ने अपने 33 वर्षों के कार्यकाल के दौरान सामान्य प्रशासन और न्यायिक कार्य के अलावा देश की आतंरिक सुरक्षा, ग्रामीण विकास, वित्त और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया। देश में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट (एनआईडीएम) के कामों को आगे बढ़ाने में इनकी अहम भूमिका रही। गौरतलब है कि डॉ आर के श्रीवास्तव ने आपदा प्रबंधन विषय पर पीएचडी की है। वह कहते हैं कि मैं तो रिसर्च का काम करना चाहता था लेकिन मित्रों, परिजनों और शुभचिंतकों के आग्रह पर पहले पुलिस सेवा और फिर सिविल सेवा में आया। खुशनसीब रहा कि पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड में शुरूआत करने के बाद मुझे केंद्र में अहम् पदों पर काम करने का मौका मिला। मैं शुरू में विज्ञान का विद्यार्थी रहा। एमए अर्थशास्त्र में किया लेकिन आपदा प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन पर काम करके सुकून मिला। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सिक्योरिटी एंड सेफ्टी मैनेजमेंट (आईआईएसएसएम) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और ‘सुरक्षित संसार‘ (Safer World) के प्रधान संपादक प्रो संतोष कुमार ने डॉ आर के श्रीवास्तव से विमानन क्षेत्र की चुनौतियों पे खुलकर बातचीत की। प्रस्तुत है मुख्यांश:
देश में सिविल एविएशन सेक्टर का लगातार विस्तार हो रहा है। नये-नये एयरपोर्ट बनाए जा रहे हैं। विमान यात्रियों की संख्या बढ़ रही है। आप आनेवाले वर्षों में इसे कैसे देख रहे हैं?
बेशक, सिविल एविएशन सेक्टर में पिछले 20-25 वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। आज अमेरिका और चीन के बाद विमानन क्षेत्र में भारत तीसरा सबसे बड़ा बाजार बन चुका है। पहले देश में सिर्फ एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइन्स की विमान सेवाएं मिलती थीं। अब एयर इंडिया के अलावा इंडिगो, स्पाइसजेट, विस्तारा, आकाश एयर, डेक्कन आदि कई कंपनियां अपने नेटवर्क का विस्तार कर रही हैं। प्रतिस्पर्धा बढ़ी तो किराये कम हो गए। कोरोना महामारी के बाद विमान यात्रियों की संख्या में तेजी से उछाल आया है। वर्ष 2024 में 15
करोड़ से अधिक घरेलू यात्रियों ने देश में विमान सेवा का उपयोग किया। इसके अलावा लगभग 6 करोड़ अंतर्राष्ट्रीय यात्री भारत में उतरे। अगर, यही हालात रहे तो 2030 तक यह संख्या दोगुनी हो सकती है। अब विमान यात्रा शौक या रोमांच नहीं, बल्कि लोगों की जरूरत बन गई है। रेलवे में टिकट का संशय रहता है लेकिन विमान यात्रा में यह दिक्कत नहीं है। वर्तमान सरकार की ‘उड़ान’ (Ude Desh ka Aam Nagarik) योजना के तहत छोटे और मझोले शहरों को विमानन नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है। 2023 तक देश में 140 एयरपोर्ट कार्यशील थे। 2040 तक यह संख्या 200 से अधिक होने की संभावना है। इसलिए मैं तो आने वाले समय में विमानन क्षेत्र का भविष्य उज्वल देख रहा हूं।
देश में पिछले 50 दिनों में कुल 6 विमान दुर्घटनाएं हुई हैं। इनमें एक बोइंग और 5 हेलीकॉप्टर शामिल हैं। अचानक ये हादसे कैसे बढ़ गए ? तकनीकी कारण तो ब्लैक बॉक्स की जांच रिपोर्ट से पता चलेगा लेकिन आम आदमी इसे कैसे समझे ?
देखिए, आपने बहुत ही संवेदनशील और महत्वपूर्ण सवाल पूछा है। जब 50 दिनों में इतने हादसे होंगे तो आम जनता में चिन्ता और सवाल उठना
वाजिब है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि देश में सड़क और रेल दुर्घटनाएं कितनी होती हैं? उस हिसाब से विमान और हेलीकॉप्टर हादसे काफी कम हैं। साथ ही मैं यह भी कहना चाहूंगा कि ऐसे हादसे एकदम नहीं होने चाहिए। भारत का एविएशन सेक्टर आईसीएओ जैसे वैश्विक मानकों का पालन करता है। लेकिन कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं। मसलन, छोटे हवाई क्षेत्रों में एटीसी या नेविगेशन सपोर्ट का अभाव, अनुभवी पायलटों की कमी और चार्टर ऑपरेटरों की निगरानी में लील इत्यादि। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि पिछले कुछ वर्षों में चार्टर हेलीकॉप्टर उड़ानों में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है। अमरनाथ यात्रा, केदारनाथ यात्रा, माता वैष्णो देवी यात्रा, वीआईपी मूवमेंट, सिनेमा की शूटिंग और माइनिंग क्षेत्रों में इनकी मांग बढ़ी है। वैसे अंतिम वजह तो ब्लैक बॉक्स की रिपोर्ट से ही पता चलेगी लेकिन बोइंग जैसे बड़े विमानों में मुख्यतः सेंसर या स्वचालित सिस्टम में गड़बड़ी, रनवे पर पक्षियों से टकराव, ह्यूमन एरर, वाइब्रेशन या हाइड्रोलिक फेलियर आदि कारण हो सकते हैं। इसी तरह हेलीकॉप्टर हादसों में इंजन फेल होना, रोटर या कंट्रोल सिस्टम में खराबी, पायलट का मौसम या दृश्यता को गलत समझना और रखरखाव की चूक आदि कारण हो सकते हैं। ब्लैक बॉक्स में दो डिवाइस
होते हैं सीवीआर (Cockpit Voice Recorder) और एफडीआर (Flight Data Recorder) जो तकनीकी कारणों की पुष्टि करते हैं। सरकार और डीजीसीए द्वारा हर दुर्घटना की जांच और सुधारात्मक निर्देश जारी किये जाते हैं।
डीजीसीए के आंकड़ों को सही मानें तो इस समय देश में 803 कमर्शियल एयरक्राफ्ट परिचालित हैं। दावा किया जा रहा है कि अगले पांच वर्षों में 600 एयरक्राफ्ट और जुड़ेंगे। आप भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे हैं। क्या इतने विमानों के सुरक्षित संचालन के लिए अपने देश में मूलभूत संरचना, स्टाफ और व्यवस्था है ?
बहुत ही महत्वपूर्ण सवाल है। बेशक, चुनौतियां बड़ी हैं। लेकिन ध्यान रखिए, आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है। फिलहाल एविएशन सेक्टर में लगभग 60 हजार कर्मचारी काम कर रहे हैं। इनमें 10 हजार पायलट हैं। अगले पांच वर्षों में इनकी संख्या 18 हजार करनी होगी। इसी तरह एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियरों की संख्या 7,000 से बढ़ाकर 13,000 और एयर ट्रैफिक कंट्रोलरों की संख्या 3, 500 से बढ़ाकर 6000 करनी होगी। देश में एयरपोर्ट विस्तार का काम लगातार जारी है। माननीय प्रधानमंत्री जी की इसपर विशेष नजर है। एयरलाइन्स का संचालन आसान नहीं होता। इसमें अलग-अलग तरह के लोग जुड़े रहते हैं। उन्हें उचित ट्रेनिंग की जरूरत होती है। लॉजिस्टिक सपोर्ट को बढ़ाना होगा। इसके लिए डीजीसीए को और सशक्त बनाना होगा। उसे स्वतंत्र बजट और विशेषज्ञ नियुक्त करने का अधिकार देना होगा। स्वतंत्र एविएशन सेफ्टी बोर्ड की स्थापना करनी होगी। एयरक्राफ्ट बढ़ने के साथ हर तरह के संचालनकर्मियों की संख्या बढ़ानी होगी। यह सतत प्रक्रिया है।
देश में तकरीबन 6 लाख यात्री प्रतिदिन विमान से यात्रा करते हैं। इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है। डीजीसीए की अथवा विमान कंपनियों की ? सुरक्षा से तात्पर्य वैगेज से लेकर यात्री की सुरक्षा, एयरक्राफ्ट आदि से है।
देखिए, मैंने पहले ही कहा कि कई संस्थाएं मिलकर हवाई यात्रा को सुरक्षित और आनन्दप्रद बनाती हैं। वैगेज और चेकिंग का काम सीआईएसएफ और एयरपोर्ट अथारिटी ऑफ इंडिया की है तो विमानों का परिचालन विमान कंपनियां करती हैं। उसकी निगरानी, पायलट और क्रू मेंबर की योग्यता, लाइसेंसिंग और मॉनिटरिंग, कानूनी और तकनीकी निगरानी का काम डीजीसीए के जिम्मे है। व्यापारिक लगेज का काम कोई और एजेंसी करती है। एविएशन नीति, नियम और विकास का काम सरकार करती है। डीजीसीए तो सिर्फ संचालनकर्ता है।
विमान हादसे पहले भी हुए हैं और विमानों के ब्लैक बॉक्स भी मिले हैं लेकिन जांच का नतीजा आमलोगों को नहीं चल पाता है। मसलन, राजशेखर रेड्डी और जनरल विपिन रावत का मामला। इस पर आप कुछ कहना चाहेंगे ?
यह कहना ठीक नहीं है कि विमान हादसों की जांच नहीं होती है। हर हादसे की जांच होती है। उसकी रिपोर्ट भी आती है और आवश्यक कार्रवाई भी होती है। भारत में नागरिक और सैन्य विमान, हेलीकॉप्टर हादसों की जांच प्रक्रिया अलग-अलग होती है। नागरिक विमान हादसे की जांच एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टीगेशन ब्यूरो (एएआईबी) करती है तो सैन्य विमान हादसे की जांच भारतीय वायुसेना या सेना की कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी करती है। राष्ट्रीय सुरक्षा कारणों से उसकी रिपोर्ट मीडिया में साझा नहीं की जाती है। डीजीसीए का काम घटना की तह में जाना और उसकी पुनरावृति रोकना है। जांच रिपोर्ट को जारी करना सरकार का काम होता है और वह काल, समय और परिस्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है। हां, मैं तो यही कहना चाहूंगा कि हर हादसे हमें आगे सुरक्षित रहने की प्रेरणा देते हैं।
सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने 10 साल पुरानी डीजल और 15 साल पुरानी पेट्रोल गाड़ियों के परिचालन पर रोक लगा रखी है। क्या विमानों के परिचालन पर इस तरह रोक का कोई प्रावधान नहीं होना चाहिए ? अपने देश में 35-40 साल पुराने एयरक्राफ्ट और विमानों का परिचालन होता रहा है। हादसे के बाद ही लोगों को पता चलता है कि एयरक्राफ्ट और विमान कितने पुराने थे।
देखिए, आपका सवाल तार्किक तो है। कुछ देशों में कई एयरलाइन्स 20 साल पुराने विमानों को कमर्शियल उड़ानों से हटा देती हैं। लेकिन मोटर कारों की तरह विमानन क्षेत्र में हम अभी तक पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। इसलिए दोनों की तुलना करना ठीक नहीं है। विमानों का समय-समय पर मेंटेनेंस होता रहता है। पूरी पड़ताल के बाद ही डीजीसीए उड़ान की अनुमति देता है। सूक्ष्म से सूक्ष्म जांच की जाती है। दोनों की कार्यप्रणाली अलग है। इसलिए एयरलाइन्स को आयु से जोड़ना समीचीन नहीं है।
देश में कुल 487 एयरपोर्ट हैं। इनमें 33 पूरी तरह इंटरनेशनल, 11 सीमित तौर पर इंटरनेशनल और 148 देश के अंदर घरेलू परिचालन के लिए हैं। इसके अलावा कुछ एयरफोर्स और कुछ चुनाव, शूटिंग या विशेष परिस्थितियों के लिए हैं। क्या इनके रखरखाव की नियमित जांच होती है और वह कौन करता है ?
ज्यादातर हवाई अड्डे एयरपोर्ट अथारिटी ऑफ इंडिया के कंट्रोल में हैं। कुछ एयरपोर्ट का रनवे एयरपोर्ट अथारिटी ऑफ इंडिया का है लेकिन बाकी जगह एयरफोर्स की निगरानी में रहता है। कुछ एयरपोर्ट की देखरेख राज्य सरकार पीपीपी मॉडल पर करती है तो कुछ एयरपोर्ट को एयरपोर्ट अथारिटी ऑफ इंडिया ने निजी क्षेत्र को किराये पर दिया है। लेकिन मालिकाना हक तो एयरपोर्ट अथारिटी ऑफ इंडिया का ही रहता है।
पिछले साल घरेलू उड़ानों में करीब 16 करोड़ लोगों ने सफर किया था। लेकिन लगातार हो रहे विमान हादसों से उनमें असुरक्षा की भावना रोकने के लिए आप की समझ से क्या किया जाना चाहिए ?
लगातार हादसे तो सड़कों पर हो रहे हैं। तो क्या लोग सड़कों पर चलना बंद कर देते हैं? मेरी समझ से देश में विमान यात्रा पूरी तरह सुरक्षित है। रही बात हादसों की तो हादसे कभी भी, कहीं भी हो सकते हैं। इसे पैनिक बनाना ठीक नहीं है। हां, यात्रियों की सुरक्षा के लिए एयरलाइन्स को और अधिक सजग और चौकस रहने की जरूरत है। सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। अहमदाबाद हादसे से सीख लेने की जरूरत है।
सर, आखिरी सवाल। एक संशय है। तुर्की की एक कंपनी सेलेबी एविएशन जो हवाई अड्डों पर कार्गो सेवाओं और ग्राउंड हैंडलिंग का काम करती थी, ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान तुर्की के पाकिस्तान के साथ जाने के कारण भारत सरकार ने सेलेबी का लाइसेंस रद्द कर दिया था। क्या आपको लगता है कि इससे विमानों और मालवाहकों के परिचालन में दिक्कत आएगी। सेलेबी भारत समेत कई देशों में ग्राउंड
हैंडलिंग का काम करती है।
सिर्फ सेलेबी के कारण भारत का एविएशन सेक्टर नहीं चल रहा है। सरकार का निर्णय सर्वोपरि है। देश की सुरक्षा और संप्रभुता से समझौता नहीं होना चाहिए।